युगपुरुष छत्रपति शिवाजी महाराज का गौरवशाली इतिहास
विशेष संवाददाता: शैलेंद्र श्रीमाल (पत्रकार) | वेबसाइट: KPNindia.in
* स्वराज्य की पहली गूँज (तोरण दुर्ग विजय): मात्र 16 वर्ष की आयु में शिवाजी महाराज ने बीजापुर के सुल्तान के अधीन आने वाले तोरण किले पर कब्जा किया। यह न केवल एक सैन्य जीत थी, बल्कि ‘स्वराज्य’ के उस संकल्प की शुरुआत थी जिसने आगे चलकर विशाल मराठा साम्राज्य का रूप लिया।https://www.hearingcareaid.in/
* छापामार युद्ध कला के प्रणेता: महाराज ने ‘गनिमी कावा’ यानी छापामार युद्ध नीति को विकसित किया। उन्होंने सिखाया कि कैसे कम संसाधनों और छोटी सेना के बल पर, भौगोलिक परिस्थितियों का लाभ उठाकर विशाल मुगल सेनाओं को पहाड़ी रास्तों और जंगलों में परास्त किया जा सकता है।
* प्रतापगढ़ का ऐतिहासिक युद्ध: बीजापुर के सेनापति अफजल खान ने शिवाजी को धोखे से मारने की योजना बनाई थी। लेकिन दूरदर्शी महाराज ने अपनी सुरक्षा के लिए कपड़ों के नीचे कवच और हाथों में ‘वाघ-नख’ छिपा रखा था, जिससे उन्होंने अफजल खान का वध कर दिया।
* आगरा के किले से साहसिक पलायन: औरंगजेब ने छल से महाराज को नजरबंद कर दिया था। भारी सुरक्षा के बावजूद, बीमारी का बहाना बनाकर शिवाजी महाराज मिठाई और फलों की बड़ी टोकरियों में छिपकर बाहर निकल गए, जो मुगलों की सबसे बड़ी सुरक्षा विफलता मानी जाती है।
* तानाजी और सिंहगढ़ का बलिदान: कोंढाणा किले को जीतने के लिए वीर तानाजी मालुसरे ने अपने प्राणों की आहुति दे दी। जब महाराज को जीत की खबर मिली, तो उन्होंने भारी मन से कहा था— “गढ़ आला पण सिंह गेला” (गढ़ तो आया, पर मेरा सिंह चला गया)।
* भारतीय नौसेना के आधारस्तंभ: शिवाजी महाराज पहले भारतीय शासक थे जिन्होंने समुद्र की शक्ति को पहचाना। उन्होंने कोंकण तट की रक्षा के लिए विजयदुर्ग और सिंधुदुर्ग जैसे जल-दुर्ग बनवाए और एक शक्तिशाली नौसेना खड़ी की, इसीलिए उन्हें ‘भारतीय नौसेना का जनक’ कहा जाता है।
* स्त्री सम्मान का सर्वोच्च आदर्श: कल्याण के सूबेदार की बहू को जब बंदी बनाकर लाया गया, तो महाराज ने उसे माता के समान सम्मान दिया और ससम्मान वापस भिजवाया। उन्होंने सख्त नियम बनाए थे कि युद्ध के दौरान किसी भी महिला को नुकसान नहीं पहुँचाया जाएगा।
* भव्य राज्याभिषेक (1674): रायगढ़ के दुर्ग में विद्वान पंडित गागाभट्ट द्वारा शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक संपन्न हुआ। इस दिन वे औपचारिक रूप से ‘छत्रपति’ बने और उन्होंने हिंदू पद पादशाही की घोषणा कर हिंदवी स्वराज्य को वैधानिकता प्रदान की।
* पन्हाला दुर्ग की रणनीतिक घेराबंदी: जब सिद्दी जौहर ने पन्हाला किले को घेर लिया था, तब महाराज ने भारी बारिश और अंधेरी रात का फायदा उठाकर घेरा तोड़ा। बाजी प्रभु देशपांडे ने पावनखिंड में प्राण देकर महाराज को सुरक्षित विशालगढ़ पहुँचाने का मार्ग प्रशस्त किया।
* लाल महल में शाइस्ता खान को दंड: मुगल सेनापति शाइस्ता खान ने पुणे के लाल महल पर कब्जा कर रखा था। महाराज ने सर्जिकल स्ट्राइक की तरह महल में घुसकर हमला किया, जिससे डरकर भागते हुए शाइस्ता खान को अपनी तीन उंगलियां गंवानी पड़ीं।
* अष्टप्रधान मंडल का गठन: शासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए महाराज ने आठ मंत्रियों की एक परिषद बनाई थी। इसमें पेशवा, अमात्य, सचिव और सेनापति जैसे पद थे, जो आधुनिक कैबिनेट प्रणाली का एक शुरुआती और उत्कृष्ट उदाहरण था।
* धार्मिक कट्टरता के विरुद्ध सहिष्णुता: महाराज के स्वराज्य में मस्जिदों को अनुदान दिया जाता था और उनकी सेना में कई मुस्लिम सैनिक व उच्च अधिकारी थे। उन्होंने धर्म के आधार पर कभी भेदभाव नहीं किया, लेकिन अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहे।
* किलों का अभेद्य संजाल: शिवाजी महाराज ने लगभग 360 किलों का प्रबंधन किया। उन्होंने नए किलों का निर्माण कराया और पुराने किलों की मरम्मत करवाई। ये किले न केवल सैन्य अड्डे थे, बल्कि उस समय की सुरक्षा व्यवस्था की रीढ़ की हड्डी थे।
* मराठी और संस्कृत का उत्थान: मुगलों के प्रभाव से फारसी भाषा का बोलबाला बढ़ गया था। महाराज ने ‘राज्य व्यवहार कोष’ तैयार करवाया ताकि प्रशासनिक कार्यों में मराठी और संस्कृत शब्दों का प्रयोग हो सके और स्वदेशी भाषा का गौरव बढ़े।
* सूरत का ऐतिहासिक अभियान: मुगलों की आर्थिक शक्ति को चोट पहुँचाने के लिए महाराज ने सूरत के मुगल व्यापारिक केंद्र पर दो बार आक्रमण किया। इससे प्राप्त धन का उपयोग स्वराज्य के विस्तार और सेना की मजबूती के लिए किया गया।
* अनुशासित सैन्य व्यवस्था: महाराज की सेना में लूटपाट सख्त मना थी। सैनिकों को नकद वेतन दिया जाता था और युद्ध में शहीद होने वाले सैनिकों के परिवार की पूरी जिम्मेदारी राज्य द्वारा उठाई जाती थी, जिससे सैनिकों में अटूट निष्ठा रहती थी।
* किसानों के सच्चे हितैषी: उन्होंने जागीरदारी प्रथा को खत्म कर रय्यतवारी व्यवस्था लागू की। अकाल के समय लगान माफ करना और खेती के लिए बीज व औजार उपलब्ध कराना उनकी प्राथमिकता थी, जिससे वे जनता के प्रिय ‘रय्यत के राजा’ बने।
* न्याय और दंड विधान: शिवाजी महाराज के राज्य में न्याय व्यवस्था बहुत कड़ी थी। महिलाओं के विरुद्ध अपराध या राज्य के साथ गद्दारी करने वाले को मृत्युदंड तक दिया जाता था, चाहे वह कितना ही रसूखदार क्यों न हो।
* आत्मनिर्भर भारत का विचार: उन्होंने विदेशी शक्तियों विशेषकर अंग्रेजों और पुर्तगालियों के व्यापारिक मंसूबों को पहचाना और अपने राज्य में स्वदेशी उत्पादन व संसाधनों को बढ़ावा दिया ताकि राज्य बाहरी ताकतों पर निर्भर न रहे।
* अमर राष्ट्रवाद की प्रेरणा: 3 अप्रैल 1680 को महाराज के निधन के बाद भी उनका राष्ट्रवाद जीवित रहा। उनकी प्रेरणा से ही आगे चलकर मराठों ने मुगलों को दिल्ली तक खदेड़ा और पूरे भारत में भगवा ध्वज फहराने का कार्य पूर्ण किया।










