दुनियाभर में पत्रकारों की आजादी पर प्रहार: जेलों में बंद मीडियाकर्मियों की संख्या रिकॉर्ड स्तर पर
न्यूयॉर्क/नई दिल्ली:
प्रेस की स्वतंत्रता पर वैश्विक स्तर पर संकट गहराता जा रहा है। सरकारों द्वारा मीडिया को नियंत्रित करने की बढ़ती कोशिशों के चलते पत्रकारों को हिरासत में लेने और उन्हें सलाखों के पीछे भेजने की घटनाओं में पिछले एक दशक में अभूतपूर्व उछाल आया है। ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में दुनियाभर में लगभग 330 पत्रकार जेलों में बंद हैं, जो कि एक दशक पहले की तुलना में 130 से भी अधिक है।
दमन और झूठे आरोपों का जाल
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, चीन, रूस, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, इजरायल, म्यांमार, सूडान और तुर्किये जैसे देशों में पत्रकारों के खिलाफ सबसे अधिक दमनकारी कार्रवाई की जा रही है। इन पत्रकारों पर अक्सर ‘सरकार के दुश्मन’, ‘आतंकवादी’, ‘विदेशी एजेंट’ या ‘जासूस’ होने के मनगढ़ंत आरोप लगाकर उन्हें लंबी सजा सुनाई जा रही है।
प्रमुख आंकड़े और स्थितियां:
* लंबी कैद: जेल में बंद एक-तिहाई से अधिक पत्रकार 5 साल या उससे अधिक की सजा काट रहे हैं।
* बिना दोषसिद्धि: लगभग आधे पत्रकार बिना किसी औपचारिक सजा के ही सलाखों के पीछे हैं।
* जान का जोखिम: साल 1992 के बाद से अब तक प्रेस के 129 सदस्यों की मौत उनके काम के दौरान या काम की वजह से हुई है।
* युद्ध का प्रभाव: गाजा में इजरायल के युद्ध के दौरान लगभग 100 फिलिस्तीनी पत्रकारों की गिरफ्तारी और मौत की खबरें सामने आई हैं।
भारत और अन्य देशों का संदर्भ
भारत में भी स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। पिछले महीने एक पत्रकार रवि नायर को एक कंपनी की आलोचना करने वाले पोस्ट के चलते एक साल की सजा सुनाई गई। वहीं, कंबोडिया में दो पत्रकारों को 14-14 साल की सजा दी गई और सेनेगल व इथियोपिया में मीडिया संस्थानों के लाइसेंस तक रद्द कर दिए गए हैं।
प्रेस की स्वतंत्रता किसी भी जीवंत लोकतंत्र की नींव होती है, लेकिन वर्तमान हालात यह दर्शाते हैं कि सच बोलने की कीमत अब पत्रकारों को अपनी आजादी और जान देकर चुकानी पड़ रही है।
खबर पर नजर परिवार
KPNindia.in
पत्रकार: शैलेंद्र श्रीमाल “खुशी श्रीमाल”
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