राजबाड़ा क्षेत्र में यातायात सुधार : निगम के बिना अधूरा अभियान
इंदौर के हृदय स्थल राजबाड़ा और उसके आसपास के व्यस्त बाजारों में यातायात नियंत्रण की कवायद एक बार फिर तेज होती दिखाई दे रही है। यातायात पुलिस सड़कों पर सक्रिय है, चालानी कार्रवाई हो रही है, सफेद रेखाओं के भीतर पार्किंग सुनिश्चित करने के निर्देश दिए जा रहे हैं। यह प्रयास स्वागतयोग्य है। किंतु प्रश्न यह है कि क्या यह अभियान नगर निगम के प्रभावी और ईमानदार सहयोग के बिना सफल हो सकता है?
राजबाड़ा क्षेत्र में सड़क और फुटपाथ का बड़ा हिस्सा वर्षों से अतिक्रमण की गिरफ्त में है। हाथ-ठेला व्यवसायी, फुटपाथी कारोबारी और अस्थायी दुकानें इनकी संख्या इतनी अधिक है कि पैदल चलने वालों के लिए भी समुचित स्थान नहीं बचता। ऐसे में यातायात का सुचारू संचालन केवल पुलिस बल की सख्ती से संभव नहीं। जब तक सड़क की चौड़ाई कागजों से निकलकर धरातल पर वास्तविक रूप में उपलब्ध न हो, तब तक ट्रैफिक सुधार का हर प्रयास सीमित ही रहेगा।
यह भी एक गंभीर प्रश्न है कि बार-बार हटाने की कार्रवाई के बाद वही अतिक्रमण पुनः कैसे स्थापित हो जाता है? यदि निगम के रिमूवल दल को स्पष्ट दायित्व सौंपा गया है, तो उसकी नियमित निगरानी और जवाबदेही क्यों सुनिश्चित नहीं होती? अस्थायी कार्रवाई से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलता। इससे केवल यह संदेश जाता है कि व्यवस्था में निरंतरता का अभाव है।
यातायात पुलिस और नगर निगम के बीच समन्वय इस अभियान की कुंजी है। पुलिस वाहन चालकों पर कार्रवाई कर सकती है, परंतु फुटपाथ और सड़क को अतिक्रमण मुक्त रखने की मूल जिम्मेदारी नगर निगम की है। यदि दोनों संस्थाएं साझा रणनीति, नियमित निरीक्षण और पारदर्शी कार्यप्रणाली अपनाएँ, तो राजबाड़ा क्षेत्र में वास्तविक सुधार संभव है।
राजबाड़ा केवल एक बाजार नहीं, बल्कि शहर की ऐतिहासिक पहचान भी है। यहां की अव्यवस्था इंदौर की छवि को प्रभावित करती है। इसलिए आवश्यक है कि यातायात सुधार को केवल औपचारिक अभियान न मानकर दीर्घकालिक शहरी नियोजन का हिस्सा बनाया जाए।https://www.hearingcareaid.in/
इंदौर का दिल कहे जाने वाले राजबाड़ा ने इन दिनों जैसे नई सांस ले ली है। सड़कें खुली… फुटपाथ दिखाई दे रहे हैं… और वाहन बिना धक्का-मुक्की के सरकते नजर आ रहे हैं। मानो वर्षों से जाम में फंसी आत्मा को अचानक मोक्ष मिल गया हो।
पिछले पांच दिनों से हालात ऐसे हैं कि राहगीर भी एक-दूसरे से पूछ रहे हैं “भाई, आज कोई वीआईपी आ रहा है क्या?”
असल में यह चमत्कार ‘दृढ़ इच्छाशक्ति’ का नहीं, बल्कि ‘ऊपर से आई इच्छाशक्ति’ का है।
नगर निगम की पीली गाड़ी और रिमूवल दल, जो सामान्य दिनों में सड़क किनारे खड़े होकर “स्थिति का अवलोकन” करते पाए जाते थे, अचानक क्रियाशील मुद्रा में आ गए हैं। जिन फुटपाथों पर वर्षों से कारोबार फल-फूल रहा था, वे मानो धरती में समा गए हों। लगता है जैसे अतिक्रमण को किसी ने ‘भूमिगत आंदोलन’ का प्रशिक्षण दे दिया हो “अधिकारी आए तो गायब, नजर हटे तो हाजिर!”
उधर यातायात पुलिस भी इन दिनों नई ऊर्जा से लैस दिख रही है। जो जवान चौराहों पर कभी मोबाइल स्क्रीन में ‘रील’ देखते पकड़े जाते थे, वे अब सीना तानकर वाहनों को नियंत्रित कर रहे हैं। ई-रिक्शा को अनुशासन सिखाया जा रहा है, अवैध पार्किंग पर चालान की वर्षा हो रही है। ऑटो चालक भी आजकल लाइन में खड़े होकर अपने ‘सुधारवादी’ चरित्र का प्रदर्शन कर रहे हैं।
राजबाड़ा के आसपास के बाजारों में चर्चा का विषय भी बदल गया है। पहले बात होती थी“कितना जाम है!” अब चर्चा है “कितने दिन चलेगा?”
स्थानीय लोगों की जुबान पर एक ही जुमला है “जब तक टॉनिक है, तब तक सुधार है।”
यह ‘टॉनिक’ बड़ा कमाल का है। ऊपर से डोज़ मिलते ही पूरा सिस्टम चुस्त-दुरुस्त हो जाता है। सड़कें चमकने लगती हैं, फुटपाथ सांस लेने लगते हैं, और अनुशासन खुद चलकर चौराहे पर खड़ा हो जाता है। लेकिन जैसे ही डोज़ कम होता है, व्यवस्था फिर से पुराने ‘आरामदायक’ बिस्तर पर लौट जाती है।
व्यंग्य यह नहीं कि सुधार हो रहा है। व्यंग्य यह है कि सुधार स्थायी नहीं, मौसमी है। जैसे मानसून में नदियां उफान पर आती हैं और फिर सूख जाती हैं, वैसे ही राजबाड़ा की सड़कें भी आदेशों की बरसात में साफ हो जाती हैं और फिर धीरे-धीरे अतिक्रमण की फसल लहलहाने लगती है।
सवाल यही है क्या राजबाड़ा को हमेशा ‘टॉनिक’ पर जिंदा रखना होगा?
क्या अनुशासन सिर्फ डर से जन्म लेगा?
और क्या फुटपाथों का भविष्य हमेशा ‘तिरछी नजर’ पर निर्भर रहेगा?
फिलहाल तो दृश्य सुखद है। सड़क खुली है, हवा चल रही है, और राजबाड़ा अपनी ऐतिहासिक गरिमा में मुस्कुरा रहा है।
बस देखना यह है कि यह मुस्कान स्थायी होती है… या फिर अगली खुराक तक का इंतजार करती है।
अब समय आ गया है कि कार्रवाई प्रतीकात्मक न रहे, बल्कि सतत और परिणामोन्मुखी हो। नगर निगम का ईमानदार सहयोग यदि सुनिश्चित हो जाए, तो राजबाड़ा क्षेत्र में यातायात नियंत्रण का अभियान सचमुच एक परिवर्तनकारी पहल बन सकता है।










