खबर पर नजर: क्या अंक और ग्रेड के चक्कर में हम बच्चों का बचपन छीन रहे हैं?
अंकों की अंधी दौड़ और खोता बचपन
आज के दौर में सफलता की परिभाषा केवल रिपोर्ट कार्ड के ‘नंबर’ और ‘रैंक’ तक सिमट कर रह गई है। माता-पिता की उम्मीदों का बोझ बच्चों के कंधों पर इतना भारी हो गया है कि वे किताबों के बीच तो हैं, लेकिन अपनी वास्तविक जिंदगी और रिश्तों से कोसों दूर होते जा रहे हैं। 24 घंटे पढ़ाई का दबाव बच्चे को एक मशीन में तब्दील कर रहा है।
दिखावे की खुशी, अंदर का खालीपनhttps://www.hearingcareaid.in/
हाल ही में एक ‘फर्स्ट क्लास’ आए बच्चे का वीडियो सामने आया, जहाँ जीत का जश्न तो था, लेकिन बच्चे के चेहरे पर कोई हाव-भाव या असली खुशी नहीं थी। वह नाच-गा तो रहा था, लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे वह केवल बड़ों को खुश करने के लिए ‘जबरदस्ती’ एंजॉय कर रहा हो। यह इस बात का प्रमाण है कि अत्यधिक दबाव बच्चे के भीतर की सहज मासूमियत और मस्ती को खत्म कर रहा है।
रिश्तों से कटता सामाजिक दायरा
जब एक बच्चा केवल अंकों को ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य मान लेता है, तो वह सामाजिक व्यवहार, परिवार के साथ जुड़ाव और रिश्तों की अहमियत भूलने लगता है। उसे खेल के मैदान की जगह बंद कमरा और दोस्तों की जगह किताबें ज्यादा जरूरी लगने लगती हैं। यह अलगाव भविष्य में उसे एक बेहतर इंसान बनाने के बजाय एक एकाकी (Lonely) व्यक्तित्व बना सकता है।
अभिभावकों के लिए विचारणीय प्रश्न
माता-पिता को यह समझना होगा कि अनुशासन और पढ़ाई जरूरी है, लेकिन उसकी एक सीमा होनी चाहिए। दबाव इतना न हो कि बच्चा अपनी मुस्कान ही खो दे। जीवन में केवल नंबरों के चक्कर में हम उन्हें एक ऐसा भविष्य दे रहे हैं जहाँ डिग्री तो होगी, लेकिन जीने का सलीका और यादें नहीं होंगी।
निष्कर्ष
वक्त आ गया है कि हम बच्चों को ‘नंबर लाने वाली मशीन’ नहीं, बल्कि ‘संवेदनशील इंसान’ बनाएँ। उन्हें खेलने दें, उन्हें रिश्तों को जीने दें और उन्हें वह बचपन वापस दें जो उनसे पढ़ाई के बोझ तले छीना जा रहा है। जीवन की सबसे बड़ी सफलता एक खुशहाल व्यक्तित्व है, न कि केवल एक मार्कशीट।
शैलेंद्र श्रीमाल
पत्रकार, खबर पर नजर
वेबसाइट: KPNindia.in










