खबर पर नजर के लिए मैं खुशी श्रीमाल। इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में हाल ही में हुई मौतों ने न केवल पूरे शहर को झकझोर कर रख दिया है, बल्कि सरकारी तंत्र की अकर्मण्यता और भ्रष्टाचार की कलई भी खोल दी है। दूषित पानी के सेवन से हुई इन मौतों ने प्रशासन के कुशासन और लालफीताशाही के उस भयावह चेहरे को उजागर किया है, जिसे अब तक फाइलों के पीछे छिपाया जा रहा था। इस त्रासदी ने क्षेत्र के नागरिकों में असुरक्षा का भाव भर दिया है, वहीं दूसरी ओर सत्ता के गलियारों में हलचल तो मची है, लेकिन वह संवेदनशीलता की बजाय अहंकार के रूप में सामने आ रही है।https://www.hearingcareaid.in/
आश्चर्य की बात यह है कि इतनी बड़ी मानवीय चूक और मौतों के बाद जहां सत्ताधारी नेताओं को अपनी नैतिक जिम्मेदारी समझते हुए इस्तीफा देना चाहिए था, वहां इसके उलट सवाल पूछने वालों की ‘औकात’ नापी जा रही है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी पत्रकारों और जनहित की आवाज उठाने वाले नेता प्रतिपक्ष पर जिस तरह का रौब झाड़ा जा रहा है और ‘घंटा’ व ‘औकात’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर उन्हें चुप कराने की कोशिश की जा रही है, वह बेहद निंदनीय है। अति सर्वत्र वर्जयेत्—यानी किसी भी चीज की अति का अंत निश्चित होता है, और सत्ता का यह अहंकार अब अपनी सीमाओं को लांघता हुआ प्रतीत हो रहा है।
जनता ने जिस विश्वास के साथ पार्षद से लेकर कैबिनेट मंत्री तक के पदों पर बैठाया, आज वही जनता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है। जब जनता के प्रतिनिधि मुख्यमंत्री पद की दौड़ में पीछे रह जाने की चिड़चिड़ाहट या निजी हताशा का प्रदर्शन जनता की सुरक्षा पर करने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि व्यवस्था वेंटिलेटर पर है। अब समय आ गया है कि जनता अंधभक्ति का त्याग कर अपनी लोकतांत्रिक शक्ति का अहसास कराए। नागरिकों को अब हर उस जवाबदार व्यक्ति से, जो उनके वोट से सत्ता की कुर्सी तक पहुंचा है, यह कड़ा प्रश्न करना होगा कि आखिर वे अपनी असफलताओं की जिम्मेदारी कब लेंगे और इस कुशासन के खिलाफ अपना इस्तीफा कब सौंपेंगे।
पत्रकार: शैलेंद्र श्रीमाल वेबसाइट: KPNindia.in










