मध्य प्रदेश के झाबुआ की माटी का उत्सव: भगोरिया मेला

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झाबुआ की माटी का उत्सव: भगोरिया मेला
मध्य प्रदेश के झाबुआ और अलीराजपुर जिलों की धड़कन माना जाने वाला भगोरिया मेला केवल एक हाट-बाजार नहीं, बल्कि आदिवासी संस्कृति, प्रेम और उत्साह का एक जीवंत दस्तावेज है। होली के त्योहार से सात दिन पहले शुरू होने वाला यह उत्सव आदिवासी समाज की समृद्धि और उनकी प्राचीन परंपराओं को दुनिया के सामने पेश करता है। यह मेला मुख्य रूप से भील, भिलाला और पटलिया जनजातियों द्वारा मनाया जाता है, जो अपनी विशेष वेशभूषा और वाद्य यंत्रों के साथ इस उत्सव की शोभा बढ़ाते हैं।
क्यों मनाया जाता है भगोरिया?
भगोरिया मनाए जाने के पीछे कई ऐतिहासिक और सामाजिक मान्यताएं हैं। जानकारों के अनुसार, राजा भोज के समय से ही इस मेले की शुरुआत हुई थी। उस काल में दो भील राजाओं, कासुमरा और बालून, ने अपनी राजधानी में पहली बार भगोरिया हाट का आयोजन किया था। तब से यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है। आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो यह फसल कटने की खुशी और रबी की फसल के पकने के उल्लास का प्रतीक है। लोग भगवान को धन्यवाद देने और आने वाले नए साल (होली) का स्वागत करने के लिए एकजुट होते हैं।https://www.hearingcareaid.in/
मेले की प्रमुख विशेषताएं
भगोरिया की सबसे बड़ी विशेषता इसका ‘स्वयंवर’ रूप है। हालांकि समय के साथ इसमें बदलाव आए हैं, लेकिन आज भी यह मेला युवाओं के लिए अपना जीवनसाथी चुनने का एक पारंपरिक मंच माना जाता है। कहा जाता है कि यदि कोई युवक किसी युवती को गुलाल लगाता है और युवती भी बदले में गुलाल लगा देती है, तो इसे आपसी सहमति माना जाता है। इसके अलावा, मेले में ‘पान का बीड़ा’ देने की भी एक अनूठी परंपरा रही है।
मेले का दृश्य किसी इंद्रधनुष जैसा होता है। चांदी के भारी आभूषणों से लदी महिलाएं और पारंपरिक वेशभूषा में सजे पुरुष जब ‘मांदल’ की थाप और बांसुरी की सुरीली तान पर झूमते हैं, तो पूरा झाबुआ संगीत की लहरों में डूब जाता है। यहां के झूले, कुल्फी, हार-कंगन की दुकानें और ताड़ी का आनंद इस उत्सव को पूर्णता प्रदान करता है।
हर हाट का अपना महत्व
भगोरिया किसी एक दिन का मेला नहीं है, बल्कि यह सात दिनों तक अलग-अलग गांवों और कस्बों में लगने वाले हाटों की एक श्रृंखला है। झाबुआ, थांदला, पेटलावद और रानापुर जैसे क्षेत्रों में लगने वाले हर हाट की अपनी एक विशेष पहचान होती है। कहीं ढोल की थाप प्रमुख होती है, तो कहीं गेर (नृत्य की टोली) का आकर्षण। इन सात दिनों में आदिवासी समाज अपने सारे गिले-शिकवे भुलाकर एक-दूसरे के रंग में रंग जाता है।
यह मेला केवल स्थानीय लोगों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि अब यह अंतरराष्ट्रीय पर्यटन का केंद्र बन चुका है। भगोरिया की सांस्कृतिक विरासत को देखने के लिए देश-विदेश से पर्यटक खिंचे चले आते हैं, जो इस माटी की खुशबू और यहां के लोगों के सरल जीवन को करीब से महसूस करते हैं।

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Author: KPN News

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